इस गाँव में एक वन जैसा स्थान था। वहां दिन में भी जल्दी कोई नहीं जाता था क्योंकि वह बड़ा भयानक स्थान था। कुछ दिनों पश्चात् कहीं से घूमते-घूमते साधू वेश में एक व्यक्ति आया और वहीं एक स्थान बनाकर रहने लगा। वह कई दिनों तक तपस्या करता रहा। उस साधू को मुनी की उपमा देकर यहां का नाम मुनारी रखा। इस ग्राम पंचायत में प्रतिवर्ष दीपावली बाद अन्नकूट के दिन कुश्ती व बिरहा दंगल का कार्यक्रम किया जाता है।